घटस्थापना: नवरात्रि पूजन का शुभ आरंभ और माँ दुर्गा के आशीर्वाद की कुंजी

भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर त्योहार अपने आप में एक अनूठा महत्व रखता है, और नवरात्रि उनमें से एक प्रमुख त्योहार है। यह नौ दिवसीय उत्सव देवी दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित है, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक हैं। इन नौ दिनों में, भक्त माँ दुर्गा की उपासना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। नवरात्रि की शुरुआत एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र अनुष्ठान से होती है, जिसे घटस्थापना या कलश स्थापना कहते हैं। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि माँ दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन और पूरे ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा के संचार का प्रतीक है।

घटस्थापना

घटस्थापना के बिना नवरात्रि का पूजन अधूरा माना जाता है। यह वह पहला कदम है जो नौ दिनों की आध्यात्मिक यात्रा का मार्ग प्रशस्त करता है। इस लेख में, हम घटस्थापना के महत्व, शुभ मुहूर्त, आवश्यक सामग्री, संपूर्ण विधि, और इससे जुड़े नियमों व सावधानियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, ताकि आप अपनी नवरात्रि पूजा को सही ढंग से संपन्न कर सकें और माँ दुर्गा के दिव्य आशीर्वाद के भागी बन सकें।

क्या है घटस्थापना और इसका महत्व?

घटस्थापना संस्कृत के दो शब्दों “घट” (घड़ा या कलश) और “स्थापना” (स्थापित करना) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है “कलश की स्थापना करना”। यह कलश, जिसे मिट्टी, ताँबे या पीतल का बनाया जा सकता है, ब्रह्मांड, सृष्टि और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस कलश में पवित्र जल, अनाज, सिक्के, सुपारी और अन्य शुभ वस्तुएं डालकर, इसे आम के पत्तों और नारियल से सजाया जाता है।

घटस्थापना का मुख्य उद्देश्य देवी दुर्गा का आह्वान करना और उन्हें नौ दिनों तक अपने घर में निवास करने के लिए आमंत्रित करना है। यह कलश, देवी की उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है और भक्तों के लिए एक पवित्र केंद्र बिंदु बन जाता है, जहाँ से वे अपनी प्रार्थनाएँ और भक्ति अर्पित करते हैं। यह माना जाता है कि घटस्थापना के माध्यम से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।

वैदिक परंपरा और पौराणिक कथाएँ

घटस्थापना की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसका उल्लेख हमारे वैदिक ग्रंथों तथा पुराणों में मिलता है। वेदों में कलश को “पूर्ण कुंभ” कहा गया है, जो जीवन, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने एक कलश का उपयोग किया था, जिसमें पंचतत्व समाहित थे। यह कलश सृष्टि के आरंभ और जीवन की निरंतरता का प्रतीक बन गया।

इसके अलावा, नवरात्रि के संदर्भ में, घटस्थापना का संबंध माँ दुर्गा के महिषासुर वध से भी जोड़ा जाता है। जब देवी दुर्गा ने महिषासुर का संहार करने के लिए अवतार लिया, तो देवताओं ने उनकी शक्ति का आह्वान करने के लिए विभिन्न अनुष्ठान किए, जिनमें कलश स्थापना भी शामिल थी। यह अनुष्ठान देवी की शक्ति को घर में आमंत्रित करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का एक माध्यम बन गया। यह प्रकृति के साथ हमारे जुड़ाव और जीवन के चक्र को भी दर्शाता है, खासकर जौ के अंकुरण के माध्यम से जो नई शुरुआत और प्रचुरता का प्रतीक है।

घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त: कब करें कलश स्थापना?

किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए मुहूर्त का विशेष महत्व होता है, और घटस्थापना जैसे पवित्र अनुष्ठान के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है। शुभ मुहूर्त में की गई घटस्थापना पूजा को सफल और फलदायी बनाती है।
नवरात्रि में घटस्थापना मुख्यतः प्रतिपदा तिथि को की जाती है, जो नवरात्रि का पहला दिन होता है। यह तिथि सूर्योदय के बाद शुरू होती है और इसके लिए कुछ विशेष समय निर्धारित किए गए हैं:

* प्रतिपदा तिथि: नवरात्रि के पहले दिन, प्रतिपदा तिथि को घटस्थापना की जाती है।
* द्विस्वभाव लग्न: कुछ ज्योतिषियों के अनुसार, घटस्थापना के लिए द्विस्वभाव लग्न (जैसे मिथुन, कन्या, धनु, मीन) को अत्यंत शुभ माना जाता है।
* अभिजीत मुहूर्त: यह दोपहर के समय का एक विशेष शुभ मुहूर्त होता है, जो लगभग 48 मिनट का होता है। यदि प्रतिपदा तिथि पर अन्य कोई शुभ मुहूर्त नहीं मिल रहा हो, तो अभिजीत मुहूर्त में भी घटस्थापना की जा सकती है।
* राहुकाल और यमगंड: घटस्थापना कभी भी राहुकाल या यमगंड में नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये अशुभ समय माने जाते हैं और इन समयों में किए गए कार्य सफल नहीं होते।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि घटस्थापना का सटीक शुभ मुहूर्त हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलता रहता है। इसलिए, अपनी स्थानीय पंचांग या किसी अनुभवी पंडित से सलाह लेना सबसे उत्तम होता है ताकि आप सही समय पर कलश स्थापना कर सकें। सही मुहूर्त में की गई घटस्थापना आपकी पूजा को और अधिक शक्तिशाली बनाती है।

घटस्थापना की सामग्री: पूजा के लिए आवश्यक वस्तुएँ

घटस्थापना एक विस्तृत अनुष्ठान है जिसके लिए कई पवित्र वस्तुओं की आवश्यकता होती है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपकी पूजा निर्बाध रूप से संपन्न हो, सभी सामग्री को पहले से एकत्र कर लेना चाहिए। यहाँ घटस्थापना के लिए आवश्यक प्रमुख सामग्री की सूची दी गई है:

घटस्थापना

1. कलश (घट): मिट्टी, ताँबा, पीतल या चांदी का कलश। मिट्टी का कलश सबसे शुभ माना जाता है।
2. मिट्टी: साफ और पवित्र स्थान से लाई गई मिट्टी।
3. जौ: बोने के लिए साबुत जौ के दाने (अंकुरण के लिए)।
4. सप्तधान्य: सात प्रकार के अनाज (जौ, गेहूं, चावल, मूंग, तिल, उड़द, कंगनी) – वैकल्पिक, यदि जौ उपलब्ध न हो तो।
5. गंगाजल या शुद्ध जल: कलश भरने के लिए।
6. आम के पत्ते: 5, 7 या 9 आम के पत्ते (पल्लव)।
7. नारियल: पानी वाला, जटा वाला साबुत नारियल।
8. लाल वस्त्र या चुनरी: नारियल पर लपेटने के लिए।
9. फूल: लाल गुड़हल, गेंदा, गुलाब या अन्य सुगंधित फूल।
10. दूर्वा घास: थोड़ी सी दूर्वा।
11. कुमकुम, रोली, अक्षत: पूजा के लिए।
12. हल्दी: हल्दी पाउडर या साबुत हल्दी।
13. इत्र: सुगंध के लिए।
14. सुपारी: साबुत सुपारी।
15. लौंग और इलायची: साबुत लौंग और हरी इलायची।
16. पंचरत्न: (यदि संभव हो) हीरा, पन्ना, माणिक्य, मोती, नीलम के छोटे टुकड़े।
17. सिक्के: कुछ सिक्के (दक्षिणा के लिए)।
18. कलश के नीचे रखने के लिए: थोड़े से चावल या गेहूं।
19. दीपक: घी या तेल का दीपक (अखंड ज्योति के लिए)।
20. धूपबत्ती और अगरबत्ती: सुगंध के लिए।
21. माचिस या लाइटर: दीपक जलाने के लिए।
22. चौकी/पट्टा: कलश स्थापना के लिए।
23. लाल कपड़ा: चौकी पर बिछाने के लिए।
24. देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र: पूजा के लिए।
इन सभी सामग्रियों को पहले से एकत्रित कर लेना चाहिए ताकि पूजा के समय कोई बाधा न आए।

घटस्थापना की संपूर्ण विधि: चरण-दर-चरण मार्गदर्शन

घटस्थापना की प्रक्रिया अत्यंत पवित्र और विधि-विधान से की जाती है। यहाँ चरण-दर-चरण घटस्थापना की संपूर्ण विधि का वर्णन किया गया है:

तैयारी और संकल्प

1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: सर्वप्रथम, प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ, धुले हुए वस्त्र धारण करें।
2. पूजा स्थल की सफाई: पूजा स्थल को अच्छी तरह से साफ करें, गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
3. चौकी/पट्टा स्थापित करना: एक लकड़ी की चौकी या पट्टा स्थापित करें और उस पर लाल रंग का साफ कपड़ा बिछाएँ।
4. देवी प्रतिमा स्थापित करना: चौकी पर माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि संभव हो, तो गणेश जी की प्रतिमा भी रखें।
5. संकल्प लेना: दाहिने हाथ में थोड़ा जल, फूल और चावल लेकर अपनी मनोकामना और पूजा का संकल्प लें। बोलें, “हे माँ दुर्गा, मैं (अपना नाम) आज से नौ दिनों तक आपकी उपासना का व्रत लेता/लेती हूँ। मेरी पूजा स्वीकार करें और मुझे आशीर्वाद दें।” जल को जमीन पर छोड़ दें।

जौ बोने की विधि

1. मिट्टी का पात्र: एक चौड़े मुँह वाला मिट्टी का पात्र (या गमला) लें।
2. मिट्टी फैलाना: पात्र में पवित्र मिट्टी की एक परत फैलाएँ।
3. जौ बोना: मिट्टी के ऊपर जौ के दानों को समान रूप से फैलाएँ। आप जौ की दो या तीन परतें भी बना सकते हैं।
4. मिट्टी से ढकना: जौ को मिट्टी की एक हल्की परत से ढक दें।
5. जल छिड़कना: हल्के हाथ से थोड़ा जल छिड़कें। यह पात्र कलश के नीचे रखा जाएगा।

कलश स्थापना

1. कलश तैयार करना: अपने चुने हुए कलश को अच्छी तरह साफ करें।
2. पवित्र जल भरना: कलश में गंगाजल या शुद्ध जल भरें।
3. शुभ वस्तुएं डालना: कलश में एक सिक्का, थोड़ी सी सुपारी, लौंग, इलायची, अक्षत और हल्दी का टुकड़ा डालें। यदि उपलब्ध हो, तो पंचरत्न भी डालें।
4. आम के पत्ते: कलश के मुख पर आम के पाँच, सात या नौ पत्ते रखें।
5. नारियल स्थापित करना: एक साबुत नारियल को लाल कपड़े या चुनरी में लपेटें। इस पर कलावा बाँधें। अब इस नारियल को आम के पत्तों के ऊपर, कलश के मुख पर इस प्रकार स्थापित करें कि नारियल का मुख ऊपर की ओर रहे। कुछ परंपराओं में नारियल का मुख नीचे की ओर भी रखा जाता है।
6. स्वास्तिक और तिलक: कलश पर कुमकुम से स्वास्तिक बनाएँ और रोली-कुमकुम का तिलक लगाएँ।
7. कलश को स्थापित करना: अब इस तैयार कलश को जौ बोए हुए पात्र के ठीक बीच में स्थापित करें।

अखंड ज्योति प्रज्वलित करना

1. दीपक तैयार करना: एक बड़े मिट्टी के दीपक में शुद्ध घी या तेल डालें और रुई की बत्ती लगाएँ।
2. प्रज्वलित करना: मंत्रोच्चार के साथ दीपक को प्रज्वलित करें।
3. संकल्प: संकल्प लें कि यह अखंड ज्योति नौ दिनों तक लगातार जलती रहेगी। इसे कलश के दाईं ओर रखें।

आह्वान और पूजा

1. गणेश वंदना: सर्वप्रथम भगवान गणेश का ध्यान करें और उनकी पूजा करें।
2. माँ दुर्गा का ध्यान: अब माँ दुर्गा का ध्यान करें और मंत्रों के साथ उनका आह्वान करें।
3. षोडशोपचार पूजा: धूप, दीप, नैवेद्य (फल, मिठाई), फूल, अक्षत, कुमकुम, रोली आदि से माँ दुर्गा और स्थापित कलश की पूजा करें।
4. आरती: अंत में माँ दुर्गा की आरती करें और उनसे अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

यह विधि-विधान से की गई घटस्थापना आपकी नवरात्रि पूजा को सफल और फलदायी बनाती है।

घटस्थापना के नियम और सावधानियाँ

घटस्थापना एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसके दौरान कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। ये नियम पूजा की शुद्धता और प्रभावशीलता बनाए रखने में मदद करते हैं:

1. स्वच्छता: पूजा के दौरान और नौ दिनों तक घर में पूर्ण स्वच्छता बनाए रखें। स्वयं भी स्नान के बाद ही पूजा करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2. सात्विक भोजन: नवरात्रि के नौ दिनों तक पूर्ण रूप से सात्विक भोजन ग्रहण करें। लहसुन, प्याज, मांसाहार और शराब का सेवन वर्जित होता है।
3. ब्रह्मचर्य: इन नौ दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
4. कलश को न हिलाएँ: एक बार स्थापित करने के बाद, नौ दिनों तक कलश को अपनी जगह से हिलाना नहीं चाहिए। यह देवी की स्थायी उपस्थिति का प्रतीक है।
5. जौ में नियमित जल: जौ बोए गए पात्र में प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा जल डालते रहें ताकि अंकुर ठीक से विकसित हो सकें। ध्यान रहे कि जल अधिक न हो जिससे मिट्टी दलदली हो जाए।
6. अखंड ज्योति का ध्यान: यदि अखंड ज्योति प्रज्वलित की है, तो सुनिश्चित करें कि वह नौ दिनों तक लगातार जलती रहे। इसके लिए नियमित रूप से घी या तेल डालते रहें और बत्ती को ठीक करते रहें।
7. सकारात्मक वातावरण: घर में शांतिपूर्ण और सकारात्मक वातावरण बनाए रखें। झगड़े, क्रोध और नकारात्मक विचारों से बचें।
8. काले वस्त्रों से बचें: पूजा के दौरान काले वस्त्र धारण करने से बचें। लाल, पीला, हरा या अन्य शुभ रंग के वस्त्र पहनें।
9. दिन में सोना वर्जित: नवरात्रि के दिनों में दिन में सोना वर्जित माना जाता है।

इन नियमों का पालन करने से घटस्थापना का पूर्ण फल प्राप्त होता है और माँ दुर्गा की विशेष कृपा बनी रहती है।

घटस्थापना का फल: क्या मिलता है इस पूजन से?

घटस्थापना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली आध्यात्मिक क्रिया है जो भक्तों के जीवन में गहरा सकारात्मक प्रभाव डालती है। इस पवित्र पूजन से अनेक प्रकार के शुभ फल प्राप्त होते हैं:

घटस्थापना

1. माँ दुर्गा का आशीर्वाद: सबसे महत्वपूर्ण फल माँ दुर्गा का प्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त होना है। यह पूजा देवी को घर में आमंत्रित करती है, जिससे उनकी कृपा पूरे परिवार पर बनी रहती है।
2. सुख-समृद्धि और शांति: घटस्थापना से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है। नकारात्मकता दूर होती है और घर का वातावरण शुद्ध होता है।
3. शत्रुओं पर विजय: माँ दुर्गा शक्ति की देवी हैं। उनकी उपासना से भक्त को आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास मिलता है, जिससे वह अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है।
4. रोग मुक्ति: यह माना जाता है कि घटस्थापना और नवरात्रि की पूजा से शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है। देवी की शक्ति रोगों का नाश करती है और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है।
5. मनोकामना पूर्ति: सच्चे मन और श्रद्धा से की गई घटस्थापना और नवरात्रि पूजा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
6. आध्यात्मिक उन्नति: यह पूजन व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है। यह ध्यान, एकाग्रता और भक्ति को बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति आत्मिक शांति का अनुभव करता है।
7. बाधाओं का निवारण: जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाएं और रुकावटें माँ दुर्गा की कृपा से दूर हो जाती हैं।
संक्षेप में, घटस्थापना एक ऐसा अनुष्ठान है जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर भक्तों को लाभान्वित करता है, उन्हें देवी दुर्गा की असीम शक्ति और प्रेम से जोड़ता है।

जौ के अंकुरों का महत्व

घटस्थापना के दौरान जौ बोने का अनुष्ठान एक विशेष महत्व रखता है। ये जौ के अंकुर न केवल प्रकृति की उर्वरता और नई शुरुआत का प्रतीक हैं, बल्कि इन्हें भविष्य के संकेत के रूप में भी देखा जाता है:

* उर्वरता और प्रचुरता: जौ के अंकुर जीवन, विकास और प्रचुरता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका हरा-भरा और स्वस्थ विकास इस बात का संकेत है कि घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि होगी।
* भविष्य का संकेत: यदि जौ के अंकुर हरे-भरे, घने और तेजी से बढ़ते हैं, तो इसे एक अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है। यह आने वाले वर्ष में सौभाग्य, सफलता और खुशी का प्रतीक है।
* अशुभ संकेत (सावधानी): यदि जौ के अंकुर पीले पड़ जाते हैं, मुरझा जाते हैं या ठीक से विकसित नहीं होते हैं, तो इसे कुछ लोग अशुभ संकेत मानते हैं। हालांकि, इसे केवल एक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए और इससे घबराना नहीं चाहिए। यह आपको अपने प्रयासों पर अधिक ध्यान देने या आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहने का संकेत हो सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि आप अपनी भक्ति और विश्वास बनाए रखें।
* प्रकृति से जुड़ाव: यह अनुष्ठान हमें प्रकृति और कृषि चक्र से जोड़ता है, जो हमारे जीवन का आधार हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हम कैसे प्रकृति से पोषण प्राप्त करते हैं और कैसे नई शुरुआत हमेशा संभव है।
नवरात्रि के समापन पर, इन जौ के अंकुरों को विसर्जित किया जाता है, जो जीवन के चक्र और प्रकृति के साथ हमारे संबंध का प्रतीक है।

नवरात्रि के नौ दिन: घटस्थापना से विजयादशमी तक

घटस्थापना नवरात्रि के नौ दिवसीय उत्सव का पवित्र आरंभ बिंदु है। इस पहले कदम के साथ, भक्त नौ दिनों की आध्यात्मिक यात्रा पर निकलते हैं, जिसमें माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की उपासना की जाती है।

* नवदुर्गा की उपासना: नवरात्रि के प्रत्येक दिन माँ दुर्गा के एक विशेष रूप (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री) की पूजा की जाती है। भक्त इन नौ देवियों को समर्पित विभिन्न मंत्रों का जाप करते हैं, आरती करते हैं और विशेष भोग अर्पित करते हैं।
* अखंड ज्योति और जौ की देखभाल: नौ दिनों तक स्थापित अखंड ज्योति को अनवरत जलाए रखा जाता है, और जौ के अंकुरों को नियमित रूप से जल दिया जाता है।
* कन्या पूजन: अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इसमें नौ छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है, उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं। यह नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक है।
* हवन: कई घरों और मंदिरों में नवरात्रि के अंतिम दिनों में या नवमी पर हवन का आयोजन किया जाता है, जिसमें देवी-देवताओं को आहुतियां दी जाती हैं।
* विजयादशमी (दशहरा): दसवें दिन, विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन दुर्गा विसर्जन किया जाता है, जिसमें घटस्थापना के कलश और जौ के अंकुरों को पवित्र नदी या जल स्रोत में विसर्जित किया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और यह दर्शाता है कि देवी अपनी यात्रा समाप्त कर अपने लोक लौट गई हैं।

यह पूरी यात्रा, घटस्थापना से लेकर विजयादशमी तक, भक्ति, त्याग और आनंद से भरी होती है, जो भक्तों को आध्यात्मिक रूप से सशक्त करती है।

निष्कर्ष

घटस्थापना नवरात्रि पूजन का केवल एक प्रारंभिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह माँ दुर्गा के प्रति हमारी श्रद्धा, आस्था और अटूट विश्वास का प्रतीक है। यह वह पवित्र क्रिया है जो हमारे घरों में देवी शक्ति का आह्वान करती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और हमें नौ दिनों की इस आध्यात्मिक यात्रा के लिए तैयार करती है। सही विधि और पूर्ण समर्पण के साथ की गई घटस्थापना न केवल हमें माँ दुर्गा का आशीर्वाद दिलाती है, बल्कि हमारे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता भी लाती है।

यह हमें प्रकृति से जुड़ने, नई शुरुआत का जश्न मनाने और जीवन के हर पहलू में देवी की उपस्थिति को महसूस करने का अवसर प्रदान करती है। इस नवरात्रि, पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ घटस्थापना करें, और माँ दुर्गा के दिव्य आशीर्वाद से अपने जीवन को आलोकित करें।
क्या आप इस नवरात्रि घटस्थापना करने की योजना बना रहे हैं? अपनी तैयारियों और अनुभवों को हमारे साथ कमेंट बॉक्स में साझा करें और माँ दुर्गा के आशीर्वाद के भागी बनें!

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